इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के बाहुबलियों की मांगी क्राइम कुंडली, सुरक्षा और शस्त्र लाइसेंसों की होगी जांच
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- Updated: 22 May, 2026 22:34
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी के बाहुबलियों की मांगी क्राइम कुंडली, सुरक्षा और शस्त्र लाइसेंसों की होगी जांच
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश के बाहुबलियों के शस्त्र लाइसेंस और सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा के आदेश दिए हैं।
न्यायालय ने गृह विभाग को कड़ी फटकार लगाते हुए तय समय सीमा के भीतर विस्तृत जांच रिपोर्ट तलब की है।
उत्तर प्रदेश। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश में कानून व्यवस्था और सुरक्षा मानकों को लेकर एक बड़ा कदम उठाया है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की पीठ ने संत कबीरनगर निवासी जयशंकर उर्फ बैरिस्टर द्वारा नियमों की अनदेखी कर शस्त्र लाइसेंस जारी किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह सख्त रुख अपनाया। सोमवार को आए इस आदेश के तहत अदालत ने रघुराज प्रताप सिंह, धनंजय सिंह, सुशील सिंह, बृज भूषण सिंह, विनीत सिंह, अजय मरहद, सुजीत सिंह बेलवा, उपेंद्र सिंह गुड्डू, पप्पू भौकाली, इन्द्रदेव सिंह, सुनील यादव, फरार अज़ीम, बादशाह सिंह, संग्राम सिंह, सुल्लू सिंह, चुलबुल सिंह, सनी सिंह, छुन्नू सिंह और डॉ. उदय भान सिंह सहित प्रदेश के 50 से अधिक रसूखदार और बाहुबली छवि वाले लोगों की आपराधिक कुंडली उत्तर प्रदेश सरकार से मांगी है। इसके साथ ही विभिन्न जोन और कमिश्नरेट जैसे नोएडा से अमित कसाना, अनिल भाटी, रणदीप भाटी, मनोज आमे, अनिल दुजाना, सुंदर सिंह भाटी, शिवराज सिंह भाटी; मेरठ से उधम सिंह, योगेश भदौड़ा, मदन सिंह बद्दो, हाजी याकूब कुरैशी, शारिक, सुनील राठी, धर्मेंद्र, यशपाल तोमर, अमरपाल कालू, अनुज बरखा, विक्रांत विक्की, हाजी इकबाल, विनोद शर्मा, सुनील उर्फ मूंछ, विनय त्यागी उर्फ टिंकू, संजीव माहेश्वरी; आगरा से अनिल चौधरी, ऋषि कुमार शर्मा; बरेली से एजाज; लखनऊ से खान मुबारक, अजय प्रताप सिंह उर्फ अजय सिपाही, संजय सिंह सिंघाला, अतुल वर्मा, मोहम्मद साहिब, सुधाकर सिंह, गुड्डू सिंह, अनूप सिंह, लल्लू यादव, बच्चू यादव, जुगनू वालिया उर्फ हरविंदर; प्रयागराज से डब्बू सिंह उर्फ प्रदीप सिंह, बच्चा पासी उर्फ निहाल सिंह, दिलीप मिश्रा, जावेद, राजेश यादव, गणेश यादव, कमरूल हसन, जाविर हुसैन; वाराणसी से त्रिभुवन सिंह उर्फ पवन सिंह, विजय मिश्रा, कुंटू सिंह उर्फ ध्रुव सिंह, अखंड प्रताप सिंह, रमेश सिंह काका, अभिषेक सिंह हनी उर्फ जहर, बृजेश कुमार सिंह, सुभाष सिंह ठाकुर, अब्बास अंसारी, पिंटू सिंह; गोरखपुर से राजन तिवारी, संजीव द्विवेदी उर्फ रामू द्विवेदी, राकेश यादव, सुधीर सिंह, विनोद उपाध्याय, रिजवान जहीर, देवेंद्र सिंह और कानपुर से अनुपम दुबे, सऊद अख्तर जैसे नामों की भी सूची और उनके शस्त्र लाइसेंसों की जांच रिपोर्ट तलब की गई है।
सुनवाई के दौरान जब गृह विभाग की ओर से हलफनामा पेश किया गया, तो उसमें दिए गए आंकड़े देखकर अदालत ने गहरी चिंता और हैरानी व्यक्त की। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस समय उत्तर प्रदेश में 10 लाख से अधिक शस्त्र लाइसेंस प्रभावी हैं, जबकि 23 हजार से अधिक आवेदन अभी भी प्रक्रिया में हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि राज्य में 6 हजार से अधिक ऐसे व्यक्तियों को शस्त्र लाइसेंस दिए जा चुके हैं जिन पर दो या उससे अधिक आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। इसके अलावा राज्य के 21 हजार परिवारों के पास एक से अधिक शस्त्र लाइसेंस हैं, और शस्त्रों से जुड़े फैसलों के खिलाफ 1,738 अपीलें फिलहाल कमिश्नरों के समक्ष लंबित हैं। इस स्थिति को देखते हुए हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए गृह विभाग के संयुक्त सचिव को निर्देश दिया है कि आगामी मंगलवार तक जोनवार, जिलावार और थानावार ऐसे सभी लोगों की सूची प्रस्तुत की जाए जिनके पास आपराधिक इतिहास होने के बावजूद शस्त्र लाइसेंस और सरकारी सुरक्षा उपलब्ध है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस रिपोर्ट के साथ संबंधित जिलों के पुलिस कप्तानों और पुलिस कमिश्नरों को एक लिखित जिम्मेदारी पत्र (अंडरटेकिंग) देना होगा, जिसमें यह प्रमाणित किया जाएगा कि कोई भी जानकारी छिपाई नहीं गई है। यदि भविष्य में कोई तथ्य ओझल पाया गया, तो इसके लिए संबंधित वरिष्ठ अधिकारी सीधे तौर पर जिम्मेदार माने जाएंगे।
अदालत ने शस्त्रों के सार्वजनिक प्रदर्शन और उनके दुरुपयोग पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि आत्मरक्षा के नाम पर हथियार रखना भले ही कानूनन सही ठहराया जाता हो, लेकिन जब इनका उपयोग दूसरों को डराने या समाज में अपना दबदबा कायम करने के लिए होने लगता है, तो यह सुरक्षा की भावना को खत्म कर समाज में भय और असुरक्षा का माहौल पैदा करता है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की पीठ ने रेखांकित किया कि खुलेआम हथियारों का प्रदर्शन करने से भले ही कुछ लोगों को अपनी शक्ति और प्रभुत्व का अहसास होता हो, परंतु इससे सामाजिक समरसता और भाईचारा पूरी तरह से प्रभावित होता है। ऐसा समाज जहां हथियारों की धमक पर वर्चस्व स्थापित किया जाता है, वह कभी भी शांतिप्रिय और सुरक्षित नहीं हो सकता। इससे आम नागरिकों का व्यवस्था पर से भरोसा डगमगाता है और सार्वजनिक शांति भंग होती है। इस मामले की अगली अहम सुनवाई और रिपोर्ट सौंपने की अंतिम तिथि मंगलवार को निर्धारित की गई है, जिस पर शासन के जवाब के बाद आगे की रूपरेखा तय होगी।

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